डरावनी आवाजें!
बात पिछले वर्ष की है,उस समय मैं गोरखपुर में रह कर पढाई करता था मेरा घर गाँव
में है जहाँ पढाई की अच्छी व्यवस्थ ना होने के कारण मैं गोरखपुर से पढाई कर रहा था
मेरा एक दोस्त भी मेरे साथ था उसका नाम पिंटू था हम दोनों ने मिलकर एक कमरा किराए
पर ले लिया था जिस मकान में हमने कमरा किराये पर लिया था उस मकान में बहुत से पढने
वाले बच्चे कमरा किराये पर ले कर रहा करते थे हमारे कमरे के बगल वाले कमरे में
बी.टेक.(B.tech.) के कुछ छात्र रहा करते थे वो लोग काफी दिनों से उस मकान में किरायदार थे,
हमें अभी कुछ ही दिन हुए थे आये हुए और सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था की होली की
छुट्टियाँ आ गयी,सभी किरायदार अपने अपने घर चले गये थे होली मनाने लेकिन हमारा
गाँव काफी दूर पड़ता है इसलिए हमने घर जाने का प्लान रद्द कर दिया और यहीं रह कर
पढाई करने का निश्चय किया किसी कारणवश हमारे कमरे के बगल वाले कमरे में जिसमें
बी.टेक. के छात्र रहा करते थे वो लोग भी यहीं रुक गये थे शायद उनका घर भी काफी दूर
पड़ता था और परीक्षा भी नज़दीक आ चुकी थी..
अगली रात मैं सो रहा था तभी कुछ आवाज़ की वजह से मेरी नींद खुल गयी, मैंने गौर
से सुना तो धप्प...धप्प्प धप्प....की आवाज़ आ रही थी और आवाज़ छत से आ रही थी कुछ
देर मैं यूँ ही सुनता रहा लेकिन आवाज़ तेज़ हो रही थी मैंने पिंटू को जगाया उसने भी
आवाज़ सुनी, ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी आदमी छत पर कूद रहा हो...बहुत देर तक आवाज़
आती रही और हम सुनते रहे सोने की कोशिश की लेकिन ठीक से नींद भी नहीं आ रही थी खैर
किसी तरह हम सो गये और सुबह हमारी आँख खुली तो हमें रात वाली बात याद आई इसलिए हम
बी.टेक. के छात्रों के पास गये और रात वाली बात बताई, हमारी बात सुनकर वो सब हसने
लगे और कहा की हम लोगों ने बहुत बार ऐसी आवाज़ सुनी है,छत पर भूत कूदते हैं,और हमें
आदत हो गयी है ऐसी आवाजों की अब हमें कोई फर्क नही पड़ता...
उनकी बातें सुनकर हमें बड़ा ताज्जुब हुआ लेकिन ज़रा भी यकीन नहीं आया हमने सोचा
की शायद बी.टेक. के छात्र हमें डराना चाहते हैं और वो ही रात में छत पर कूद रहे थे,
यही सोच कर हमने बात को वहीँ ख़तम कर दिया लेकिन अगली रात फिर वही हुआ मैं और पिंटू
पढ़ रहे थे रात के करीब 12.30 बजे होंगे की फिर वाही आवाज़ आनी शुरू हो गयी जैसी पिछली
रात को आ रही थी, आवाज़ बहुत तेज़ थी ऐसा लग रहा था जैसे कोई कूद-कूद कर छत ही गिरा
डालेगा, हमें बहुत डिस्टर्ब हो रहा था हम ठीक से पढ़ भी नहीं पा रहे थे हमें बी.टेक.
के छात्रों पर गुस्सा आ रही थी क्यूंकि हम उनसे जूनियर थे और वो हमें तंग कर हे थे
वो अपने सीनियर होने का फायदा उठा रहे थे, कुछ देर इंतज़ार करने के बाद भी जब आवाज़
कम नहीं हुई तो मैंने और पिंटू ने धीरे से छत पर जाने का निश्चय किया और बी.टेक.
के छात्रों को रंगे हाथों पकड़ने का फैसला किया..
ये सोच कर हमने टोर्च ली और दबे पाँव सीढ़ियों पर चढ़ने लगे हमें यह देखकर
आश्चर्य हुआ की छत का दरवाज़ा बाहर से बंद था सिटकनी लगी हुई थी मैंने और पिंटू ने
एक दुसरे की ओर देखा और फैसला किया की हम दरवाज़ा खोल कर छत पर जाएंगे शायद उनमें
से कुछ लोग छत पर हों और कुछ बहार से सिटकनी लगा कर कमरे में चले गये हों जिससे
किसी को शक ना हो की छत पर कोई आ सकता है, यह सोच कर हमने धीरे से दरवाज़े की
सिटकनी खोली और छत पर गये हमने टोर्च जलायी और आवाज़ वाली दिशा में देखा तो वहां
छोटे छोटे काले रंग के बच्चे कूद रहे थे जिनका आकर छोटे शिशुओं जितना था और वो
बिलकुल नंगे थे उनके मुंह में जैसे अंगारा रखा हुआ था उनके मुंह के अन्दर जैसे आग
जल रही थी उनके कूदने से ऐसी आवाज़ हो रही थी जैसे उनका वज़न हाथी के बराबर हो ये
दृश्य देखकर हमारे होश उद्द गए. पिंटू के हाथ से डर के कारण टोर्च गिर गयी और मेरे
मुंह से एक ज़ोरदार चीख निकल गयी हम वहां से सरपट सीढ़ियों के तरफ भागे सीढ़ियों से
नीचे उतरते वक़्त पिंटू का पैर फिसल गया और वो सीढयों से गिर पड़ा और बेहोश हो गया!
तभी बी.टेक. के छात्रों को हमारी चीख़ सुनाई दे गयी और वो बहार आये और पिंटू को
उठा कर अपने कमरे में ले गये मैं भी कांपते हुए उनके पीछे उनके कमरे में गया और
सारी बातें उन्हें बताई.....
कुछ दिनों बाद हमने वो मकान छोड़ दिया और दूसरी जगह रहने लगे.....
राजेन्द्र प्रसाद गुप्त
No comments:
Post a Comment