यह बात लगभग 25 साल पहले की है, तब मैं गोरखपुर में कार्यरत था, हमने माँ विध्यवासिनी के दर्शन के लिए प्लान बनाया और २ दिन बाद हम वहां गये मेरे एक मित्र जो वहां कोतवाल थे मुझे और मेरे परिवार को चुनार के दर्शनीय स्थल को देखने के लिए विन्ध्याचल धाम जाने को कहा उन्होंने विशेष आग्रह किया, हम उन्ही के घर पर रुके हुए थे और उनके मेहमान थे सो हमने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया और दुसरे ही दिन मैं और मेरा परिवार चुनार की पहाड़ियों में साधनारत संत और महात्माओं के दर्शन करने के बाद वहां के एक प्रसिद्ध सूफी-संत की मज़ार का भी दर्शन करने चले गये कहा जाता है की वहां जो भी मन्नत मांगें वो पूरी होती हैं लेकिन मैं इन् सब बातों को ज्यादा नहीं मानता ऐसा नहीं है की मैं भगवान् में विश्वास नहीं करता,लेकिन मन्नत या जादू-टोने पर मेरा विश्वास नहीं है चुनार भी मैं घूमने के मकसद से ही गया था, तो जब मैं उस मज़ार पर पहुंचा तो वहां का मौलवी बार-बार मुझसे मन्नत मांगने का आग्रह करने लगा इसलिए मैंने उस मज़ार पर कुछ मन्नतें मांग ली उसके बाद हम जाने लगे तो उस मौलवी ने जिसने मुझसे मन्नत मांगने के लिए आग्रह किया था, उसने कहा की आप इस मजार पर चादर चढ़ा दें तभी आपकी मन्नत कुबूल होगी तो मैंने कहा की मैं फिर कभी आकर चादर ज़रूर चढ़ा दूंगा,
फिर हम सब वापस आ गए और कुछ दिन चुनार में रहने के बाद हम वापस अपने घर आ गये कुछ ही दिनों में मेरी सभी मन्नतें जो मैंने मज़ार पर मांगी थी वो धीरे धीरे पूरी हो गयी लेकिन मैं उस संकल्प को भूल गया जिसके मुताबिक़ मुझे उस मजार पर चादर चढ़ाना था कुछ महीनों बाद मैं चुनार की सभी बातें बिलकुल भूल चूका था
फिर एक कुछ ऐसा हुआ की मुझे चुनार की सभी बातें बिलकुल साफ़ साफ़ याद आ गयी एक दिन मैं किसी शादी से रात में घर आ रहा था मैं अकेला ही था रास्ते में मुझे पिशाब लगी तो मैं सड़क के किनारे स्कूटर रोक कर पिशाब करने के लिए रुका सामने एक कब्रस्तान थी तभी मैं देखता हूँ की एक कब्र में से एक सफ़ेद रौशनी के साथ एक आदमी बहार निकल रहा है वो धीरे धीरे उस कब्र से ऊपर की तरफ निकल रहा है,वो पूरा आदमकद रूप में बहार आ गया उसकी लम्बी लम्बी सफ़ेद दाढ़ी थी मैं ये देख कर बहुत ज्यादा डर गया और अचानक वो आदमकद रौशनी मेरे तरफ बढ़ने लगी मैं फ़ौरन वहां से भाग जाना चाहता था लेकिन मेरे पैर बिलकुल स्थिर हो गये थे मैं हिल भी नहीं पा रहा था मेरा पूरा जिस्म बिलकुल ठंडा पड़ गया था और कुछ ही देर में वो आदमकद रौशनी बिलकुल मेरे सामने खड़ी थी वो आदमकद रौशनी किसी पीर-बाबा की लग रही थी मैं निढाल सा खड़ा था तभी उस आदमकद रौशनी ने गरजकर कहा की- क्यूँ रे अपना वादा भूल गया क्या?तेरी सभी मुरादें तो पूरी हो गयी लेकिन तू वापस नहीं आया?
और फिर वो आदमकद आकृति गायब हो गयी और मुझे लगा जैसे मैं कोई सपना देख रहा था और बस अभी जागा हूँ, मैं फ़ौरन वहां से अपने घर आया मैं पसीने से भीगा हुआ था मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा की क्या हुआ आप इतने घबराये हुए क्यूँ हैं? और मैंने सारी बात अपनी पत्नी को बताई उसने कहा की हमें वहां फिर जाना चाहिए और चादर चढ़ानी चाहिए,
और तीन चार दिन बाद हम सपरिवार चुनार जाकर उस मज़ार पर चादर चढ़ाई और अपनी गलती के लिए छमा मांगी मुझे वहां जा के बहुत सुकून महसूस हुआ उसके बाद से हम बहुत बार वहां जा चुके हैं.
फिर हम सब वापस आ गए और कुछ दिन चुनार में रहने के बाद हम वापस अपने घर आ गये कुछ ही दिनों में मेरी सभी मन्नतें जो मैंने मज़ार पर मांगी थी वो धीरे धीरे पूरी हो गयी लेकिन मैं उस संकल्प को भूल गया जिसके मुताबिक़ मुझे उस मजार पर चादर चढ़ाना था कुछ महीनों बाद मैं चुनार की सभी बातें बिलकुल भूल चूका था
फिर एक कुछ ऐसा हुआ की मुझे चुनार की सभी बातें बिलकुल साफ़ साफ़ याद आ गयी एक दिन मैं किसी शादी से रात में घर आ रहा था मैं अकेला ही था रास्ते में मुझे पिशाब लगी तो मैं सड़क के किनारे स्कूटर रोक कर पिशाब करने के लिए रुका सामने एक कब्रस्तान थी तभी मैं देखता हूँ की एक कब्र में से एक सफ़ेद रौशनी के साथ एक आदमी बहार निकल रहा है वो धीरे धीरे उस कब्र से ऊपर की तरफ निकल रहा है,वो पूरा आदमकद रूप में बहार आ गया उसकी लम्बी लम्बी सफ़ेद दाढ़ी थी मैं ये देख कर बहुत ज्यादा डर गया और अचानक वो आदमकद रौशनी मेरे तरफ बढ़ने लगी मैं फ़ौरन वहां से भाग जाना चाहता था लेकिन मेरे पैर बिलकुल स्थिर हो गये थे मैं हिल भी नहीं पा रहा था मेरा पूरा जिस्म बिलकुल ठंडा पड़ गया था और कुछ ही देर में वो आदमकद रौशनी बिलकुल मेरे सामने खड़ी थी वो आदमकद रौशनी किसी पीर-बाबा की लग रही थी मैं निढाल सा खड़ा था तभी उस आदमकद रौशनी ने गरजकर कहा की- क्यूँ रे अपना वादा भूल गया क्या?तेरी सभी मुरादें तो पूरी हो गयी लेकिन तू वापस नहीं आया?
और फिर वो आदमकद आकृति गायब हो गयी और मुझे लगा जैसे मैं कोई सपना देख रहा था और बस अभी जागा हूँ, मैं फ़ौरन वहां से अपने घर आया मैं पसीने से भीगा हुआ था मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा की क्या हुआ आप इतने घबराये हुए क्यूँ हैं? और मैंने सारी बात अपनी पत्नी को बताई उसने कहा की हमें वहां फिर जाना चाहिए और चादर चढ़ानी चाहिए,
और तीन चार दिन बाद हम सपरिवार चुनार जाकर उस मज़ार पर चादर चढ़ाई और अपनी गलती के लिए छमा मांगी मुझे वहां जा के बहुत सुकून महसूस हुआ उसके बाद से हम बहुत बार वहां जा चुके हैं.
हरद्वार सिंह श्रीनेत, गोरखपुर
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