ये घटना मेरे बचपन की है तब मेरी उम्र करीब 10 साल रही होगी वैसे तो मुझे मुझे मेरे बचपन की बहुत कम बातें याद हैं लेकिन ये बात मुझे बिलकुल साफ़ साफ़ याद है जो आज मैं आपसे शेयर करने जा रहा हूँ..
बात उन् दिनों की है जब मैं गाँव में रहता था मेरे पिताजी शहर में सरकारी नौकरी करते थे हमारा घर बहुत छोटा और कच्चा था हमारे घर के बगल वाले मकान में एक बुढ़िया रहती थी बिलकुल पागल सी उसका इस दुनिया में कोई नहीं था सिर्फ एक बेटा था जो की दिल्ली में रहकर काम करता था वो कई सालों से घर नहीं आया था सिर्फ महीने दो महीने में कुछ पैसे भेज दिया करता था जिससे बुढ़िया का गुज़ारा बड़ी मुश्किल से हो पाता था कभी कभी हमारे घर से या किसी और के घर से बुढ़िया के लिए खाना जाया करता था मैं खुद कभी कभी कभी बुढ़िया के लिए खाना ले जाया करता था मुझे उसका घर अभी भी याद है उसका घर बिलकुल खण्डहर हो चूका था बिलकुल पुराना गिरा पड़ा सा...बुढ़िया का बस एक ही काम था जिंदा रहना और अपने इकलौते बेटे का इंतज़ार करना मैंने कभी उसके बेटे को नहीं देखा था घरवाले बताते थे की उसका बेटा बहुत कम उम्र में ही घर छोड़ कर चला गया था और तबसे बुढ़िया बिलकुल पागल सी हो गयी थी न किसी से बोलती थी न कभी किसी ने उसे हँसते हुए देखा था बस हमेशा कुछ बडबडाया करती थी लेकिन कुछ समझ में नहीं आता था की क्या कह रही है..
एक रात मैं अपने घर पर सो रहा था आधी रात के करीब कुछ शोर सुनकर मैं जग गया, शोर बाहर से आ रहा था, मैं बहार गया और देखा की बुढ़िया “बेटा...बेटा”.. चिल्ला रही है और आस पड़ोस के कुछ लोग और मेरे पिताजी उसे समझा रहे हैं की कोई नहीं है...तेरा बेटा नहीं आया है... लेकिन बुढ़िया किसी की नहीं सुन रही थी उसने कहा की थोड़ी देर पहले वो सो रही थी तो उसके बेटे नें “अम्मा ऐ अम्मा” कह के उसे बुलाया था वो दरवाज़े के पीछे खड़ा था मैंने दरवाज़ा खोला तो वो नहीं था यहीं कहीं होगा शायद अभी आएगा और फिर बुढ़िया जोर जोर से “बेटा बेटा....बेटा” पुकारने लगी..
मुझे बुढ़िया पे बहुत तरस आ रहा था बस यही मन कर रहा था की उसके बेटे के पास दिल्ली जाऊं और उसे घर ले आऊँ, लेकिन मैं बहुत छोटा था और इसीलिए बहुत भावुक भी था काश की मैं बड़ा होता और उतना ही भावुक रहा होता तो एक बार ज़रूर कोशिश करता की उसके बेटे को अपने साथ बुढ़िया के पास ले आता मेरे दिमाग में उस वक़्त इस प्रकार के बहुत से ख्याल आ रहे थे....फिर कब मैं सो गया और क्या हुआ मुझे याद नहीं..
फिर मैं सुबह उठा तो पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था चारों तरफ जैसे मनहूसियत सी तारी थी मैं आँखें मलता हुआ अपनी माँ के पास गया, वो बाहर थी और बरामदे में बहुत सी औरतें बैठी हुई थीं और बुढ़िया के घर पर काफी भीड़ जमा थी मैं भागता हुआ बुढ़िया के घर की तरफ गया लेकिन रास्ते में ही मेरे पिता जी ने मुझे पकड़ लिया और वापस घर ले आये मेरी माँ के पास, मैंने बहुत पूछा की क्या हुआ ?? लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया बस वहां जाने से मना किया मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था मुझे लगा की बुढ़िया का देहांत हो गया इसलिए मुझे वहां जाने नहीं दे रहे हैं और मैं निराश सा घर के अन्दर आ गया और अपने कमरे में बैठा था तभी मेरी दीदी जो की मुझसे उम्र में बड़ी थी कमरे में आई और मुझे मायूस देख कर पूछा की क्या हुआ तो मैंने बताया की पिताजी मुझे बहार जाने नहीं दे रहे हैं! मैंने दीदी से पूछा की क्या बुढ़िया मर गयी?
तो दीदी ने मुझे पूरी बात बताई जिस पर यकीन करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था और सिर्फ मेरे लिए ही नहीं सबके लिए मुश्किल था!
दीदी ने बताया की कल रात में बुढ़िया का बेटा ट्रेन से घर वापस आ रहा था और रास्ते में ट्रेन से गिर कर उसकी मौत हो गयी है और उसकी लाश को यहाँ लाया गया है..मैं बिलकुल अवाक रह गया मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, जैसे दिमाग ने एक पल के लिए काम करना ही बंद कर दिया हो..शाम को उसका अंतिम संस्कार हुआ.
और मैंने सुना की बुढ़िया की आँख से एक आंसू भी नहीं गिरा वो बिलकुल चुपचाप बैठी रही बिलकुल सदमे की हालत में....न रोई न कुछ कहा..मैं पूरा दिन सिर्फ बुढ़िया के बारे में सोचता रहा और सुबह मेरी आँख खुली तो एक और भयानक हक़ीक़त से सामना हुआ जिसका अंदाजा हम सभी को था, उसी रात सदमे की वजह से बुढ़िया की भी मौत हो चुकी थी.. बुढ़िया का इंतज़ार अब ख़तम हो चूका था वो जिंदा रह के भी क्या करती..
मैं उस दिन बहुत रोया था ये मेरे बचपन की सबसे भयानक याद है जो मुझे आज भी बिलकुल याद है...
बात उन् दिनों की है जब मैं गाँव में रहता था मेरे पिताजी शहर में सरकारी नौकरी करते थे हमारा घर बहुत छोटा और कच्चा था हमारे घर के बगल वाले मकान में एक बुढ़िया रहती थी बिलकुल पागल सी उसका इस दुनिया में कोई नहीं था सिर्फ एक बेटा था जो की दिल्ली में रहकर काम करता था वो कई सालों से घर नहीं आया था सिर्फ महीने दो महीने में कुछ पैसे भेज दिया करता था जिससे बुढ़िया का गुज़ारा बड़ी मुश्किल से हो पाता था कभी कभी हमारे घर से या किसी और के घर से बुढ़िया के लिए खाना जाया करता था मैं खुद कभी कभी कभी बुढ़िया के लिए खाना ले जाया करता था मुझे उसका घर अभी भी याद है उसका घर बिलकुल खण्डहर हो चूका था बिलकुल पुराना गिरा पड़ा सा...बुढ़िया का बस एक ही काम था जिंदा रहना और अपने इकलौते बेटे का इंतज़ार करना मैंने कभी उसके बेटे को नहीं देखा था घरवाले बताते थे की उसका बेटा बहुत कम उम्र में ही घर छोड़ कर चला गया था और तबसे बुढ़िया बिलकुल पागल सी हो गयी थी न किसी से बोलती थी न कभी किसी ने उसे हँसते हुए देखा था बस हमेशा कुछ बडबडाया करती थी लेकिन कुछ समझ में नहीं आता था की क्या कह रही है..
एक रात मैं अपने घर पर सो रहा था आधी रात के करीब कुछ शोर सुनकर मैं जग गया, शोर बाहर से आ रहा था, मैं बहार गया और देखा की बुढ़िया “बेटा...बेटा”.. चिल्ला रही है और आस पड़ोस के कुछ लोग और मेरे पिताजी उसे समझा रहे हैं की कोई नहीं है...तेरा बेटा नहीं आया है... लेकिन बुढ़िया किसी की नहीं सुन रही थी उसने कहा की थोड़ी देर पहले वो सो रही थी तो उसके बेटे नें “अम्मा ऐ अम्मा” कह के उसे बुलाया था वो दरवाज़े के पीछे खड़ा था मैंने दरवाज़ा खोला तो वो नहीं था यहीं कहीं होगा शायद अभी आएगा और फिर बुढ़िया जोर जोर से “बेटा बेटा....बेटा” पुकारने लगी..
मुझे बुढ़िया पे बहुत तरस आ रहा था बस यही मन कर रहा था की उसके बेटे के पास दिल्ली जाऊं और उसे घर ले आऊँ, लेकिन मैं बहुत छोटा था और इसीलिए बहुत भावुक भी था काश की मैं बड़ा होता और उतना ही भावुक रहा होता तो एक बार ज़रूर कोशिश करता की उसके बेटे को अपने साथ बुढ़िया के पास ले आता मेरे दिमाग में उस वक़्त इस प्रकार के बहुत से ख्याल आ रहे थे....फिर कब मैं सो गया और क्या हुआ मुझे याद नहीं..
फिर मैं सुबह उठा तो पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था चारों तरफ जैसे मनहूसियत सी तारी थी मैं आँखें मलता हुआ अपनी माँ के पास गया, वो बाहर थी और बरामदे में बहुत सी औरतें बैठी हुई थीं और बुढ़िया के घर पर काफी भीड़ जमा थी मैं भागता हुआ बुढ़िया के घर की तरफ गया लेकिन रास्ते में ही मेरे पिता जी ने मुझे पकड़ लिया और वापस घर ले आये मेरी माँ के पास, मैंने बहुत पूछा की क्या हुआ ?? लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया बस वहां जाने से मना किया मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था मुझे लगा की बुढ़िया का देहांत हो गया इसलिए मुझे वहां जाने नहीं दे रहे हैं और मैं निराश सा घर के अन्दर आ गया और अपने कमरे में बैठा था तभी मेरी दीदी जो की मुझसे उम्र में बड़ी थी कमरे में आई और मुझे मायूस देख कर पूछा की क्या हुआ तो मैंने बताया की पिताजी मुझे बहार जाने नहीं दे रहे हैं! मैंने दीदी से पूछा की क्या बुढ़िया मर गयी?
तो दीदी ने मुझे पूरी बात बताई जिस पर यकीन करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था और सिर्फ मेरे लिए ही नहीं सबके लिए मुश्किल था!
दीदी ने बताया की कल रात में बुढ़िया का बेटा ट्रेन से घर वापस आ रहा था और रास्ते में ट्रेन से गिर कर उसकी मौत हो गयी है और उसकी लाश को यहाँ लाया गया है..मैं बिलकुल अवाक रह गया मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, जैसे दिमाग ने एक पल के लिए काम करना ही बंद कर दिया हो..शाम को उसका अंतिम संस्कार हुआ.
और मैंने सुना की बुढ़िया की आँख से एक आंसू भी नहीं गिरा वो बिलकुल चुपचाप बैठी रही बिलकुल सदमे की हालत में....न रोई न कुछ कहा..मैं पूरा दिन सिर्फ बुढ़िया के बारे में सोचता रहा और सुबह मेरी आँख खुली तो एक और भयानक हक़ीक़त से सामना हुआ जिसका अंदाजा हम सभी को था, उसी रात सदमे की वजह से बुढ़िया की भी मौत हो चुकी थी.. बुढ़िया का इंतज़ार अब ख़तम हो चूका था वो जिंदा रह के भी क्या करती..
मैं उस दिन बहुत रोया था ये मेरे बचपन की सबसे भयानक याद है जो मुझे आज भी बिलकुल याद है...
सुरेन्द्र प्रताप (उत्तर प्रदेश)
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